"जल ही जीवन है" से "जल में ही मृत्यु है" तक के कगार पर पहुंच गया है बिहार और असम।

"जल ही जीवन है" से "जल में ही मृत्यु है" तक के कगार पर पहुंच गया है बिहार और असम।
Posted By: Admin
20-Jul-2019

बात बिहार की करते हैं,
यह कोई पहला बाढ़ का संकट नहीं। हर साल बरसात का पानी भयंकर बाढ़ का रूप लेकर तबाही मचाता है। लेकिन भी सरकार और प्रशासन इस समस्या का समाधान नहीं निकाल पा रही।
आखिर क्या कारण है कि सरकार और प्रशासन आंखें मूंदे हुए बैठे हैं? जवाब साफ है कि अभी तक ऐसा बाढ़ नहीं आया है जिससे सरकार और कुर्सी डूबे।

लोग बेघर हो चुके हैं, भुखे बदहाल भटक रहे हैं लेकिन राज्य सरकार बचाव और राहत कार्य की खानापूर्ति के सिवाय कुछ नहीं कर रही।
सवाल बेहद महत्वपूर्ण है कि क्यों बाढ़ के संकट से निपटने की तैयारी नहीं कर पाता प्रशासन?
आला अधिकारियों को निर्देश नहीं दिए जाते या फिर जनता की याद महज़ चुनाव के दौरान आती है?

समस्या गंभीर है और निजात का कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। ऐसे में मुख्यमंत्री का हेलीकाप्टर दौरा क्या साबित करता है कि तबाही ज्यादा नहीं हूई है या फिर इतनी भी जान नहीं गई है कि हमारा वोट बैंक कमजोर पड़े।
हवाई दौरे और आसमानी सर्वेक्षण करने के बजाय अधिकारियों को समय रहते पुख्ता इंतजाम के निर्देश दिए जाते तो मासूम जिंदगियां बच सकती थी । मगर बिहार सरकार को अपनी कुर्सी के डूबने का डर लोगों के डूब कर मरने से कहीं ज्यादा है। राजनीति के खेल में मासूम जनता को मोहरा बनाया जाना अब आम है।

बाढ़ का पानी और तबाही तो कुछ दिन में थम जाएगी मगर जो जिंदगियां उजड़ गई हैं वो बस नहीं पाएंगी। लोगों के घर, राशन, खेत-खलिहान, मवेशी, सब कुछ बाढ़ ने निगल लिया है। ऐसे में लाचार आदमी करे तो क्या करे।

श्रेया भगत


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